विपक्ष मांगेगा महिला आरक्षण पर सभी दलों की बैठक, चुनावों के बाद तक देखा जा सकता है

Ranjit Sapre मार्च 26, 2026 राजनीति 0 टिप्पणि
विपक्ष मांगेगा महिला आरक्षण पर सभी दलों की बैठक, चुनावों के बाद तक देखा जा सकता है

मालिकार्जुन खरगे, राज्यसभा में विपक्ष के नेता ने बुधवार, 24 मार्च 2026 को एक औपचारिक पत्र लिखकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाया है। विपक्षी पक्ष इस बार सिर्फ धाराणा नहीं रख रहा, बल्कि स्पष्ट दिशा चाहता है—महिला आरक्षण कार्यान्वयन पर सभी दलों की बैठक का आयोजन करें, लेकिन एक शर्त के साथ: यह बैठक तब होने दी जाए जब राज्य विधानसभाओं के चुनाव खत्म हो चुके हों।

यह मामला बस एक पत्र-पत्राचार तक सीमित नहीं है; यह भारतीय राजनीति का एक मोड़ बन सकता है। पिछले हफ्ते, यानी 16 मार्च को, संसदीय कार्य मंत्री किरण रिझू ने ही कांग्रेस अध्यक्ष खरगे को चिट्ठी लिखी थी कि 2023 की 'नरि शक्ति वंदन अधिनियम' को लागू करने पर सर्वसम्मत राय जुटाने की आवश्यकता है। अब पॉच बदली हुई है। विपक्ष मानता है कि अगर अब बैठक होगी, तो इसे कुछ राज्यों में चल रहे चुनावों का हिस्सा न समझा जाए।

सरकार की योजना: सीटें बढ़ानी हैं या डिलीमिटेशन इंतजार करना है?

कौन सी चीज सबसे ज्यादा अजीब लगती है? बड़े बदलाव के लिए छोटी-मोटी गिरवीं रखने का काम। वर्तमान कानून कहता है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तब लागू होगा जब जनगणना पूरे होगी और निर्वाचन क्षेत्रों का फिर से आकार (delimitation) तय होगा। लेकिन सरकार का कहना है कि इंतजार करना जरूरी नहीं।

सूत्रों के अनुसार, सरकार संसद की बजट सत्र में दो नए बिल लाने की सोच रही है। इन बिलों का मकसद 2011 की जनगणना का आधार रखना है, ताकि डिलीमिटेशन से बंधे बिना ही आरक्षण दिया जा सके। यहाँ गणित थोड़ा दिलचस्प होता है। अगर यह प्रस्ताव पास हुआ, तो लोक सभा की कुल सीटें मौजूदा 543 से बढ़कर 816 हो सकती हैं। इनमें 273 सीटें सीधे तौर पर महिलाओं के लिए सुरक्षित रहेंगी।

गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में एनडीए गठबंधन और कुछ स्थानीय दलों के नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें की हैं। उनका संकेत था कि अगर राजनीतिक सहमति मिल जाए, तो अगले कुछ दिनों में ही ये बिल पेश हो सकते हैं। सरकार की जल्दबाजी स्पष्ट है, क्योंकि वे चाहते हैं कि यह ऐतिहासिक कदम बाधाओं के रुकावटों से पहले ही लिया जाए।

विपक्ष की दो बड़ी चेतावनियां

विपक्ष का तर्क साफ है: "बहुमत वालों का फैसला, अथर्वत फैसला?" उनकी पहली चिंता समय संबंधित है। कई राज्यों में अभी भी मतदान जारी है। ऐसे समय में महिला अधिकारों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर अस्थायी नियम बनाना राजनीतिक लाभ लेने का रूप ले सकता है। झारखंड मुक्ति मोर्चा की सांसद महुआ मेघ्र ने साफ कहा कि चुनावों के बाद ही सभी दलों की उपस्थिति में सुविधाजनक चर्चा होनी चाहिए।

दूसरी और ज़मीनी समस्या: पीछे रह गया कोटा। विपक्ष का कहना है कि अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) महिलाओं के लिए सब-क्वोटा मौजूद है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिलाओं को कोई विशेष सुरक्षा नहीं मिली। यह असंतुलन उन्हें मानवाधिकार की परिभाषा से बाहर रखता है। इसलिए, कांग्रेस समेत अन्य दल ओबीसी महिलाओं के लिए अलग आवंटन की मांग कर रहे हैं।

  • महिला आरक्षण को लागू करते समय ओबीसी वर्ग को शामिल किया जाना चाहिए।
  • परिवर्तन की प्रक्रिया किसी भी तरह से चल रहे चुनावों को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।
  • निर्णय सभी राजनीतिक दलों की सहमति से लिए जाने चाहिए, न कि केवल संसद में बहुमत से।
भविष्य क्या लाएगा?

भविष्य क्या लाएगा?

अब देखना यह है कि क्या सरकार अपना 'एकल' तरीका अपनाती है या विपक्ष की बैठक की मांग को मानती है। दोनों पक्षों को समझना पड़ेगा कि अगर इस मुद्दे पर राजनीतिक संघर्ष बढ़ा, तो अंत में हारा किसकी होगी? सामाजिक न्याय का पैमाना हमेशा राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर रखा जाता है, बशर्ते राजनीतिक नेतृत्व उसे स्वीकार करे।

उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में संसदीय कार्य मंत्रालय से कोई स्पष्ट बयान आएगा कि क्या 2026 के बजट सत्र में वास्तव में संशोधन bills पेश किए जाएंगे। यदि नहीं, तो विवाद लंबा हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महिला आरक्षण अधिनियम में मुख्य प्रावधान क्या है?

इस अधिनियम के तहत लोक सभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत (एक तिहाई) सीटें आरक्षित की जाएंगी। हालांकि, इसका कार्यान्वयन जनगणना और सीमा निर्धारण (delimitation) के बाद ही शुरू होने की शर्त है, जो अभी विवाद का केंद्र है।

विपक्ष को चुनावों से पहले बैठक में देरी क्यों चाहिए?

विपक्ष का मानना है कि चूंकि कई राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, इसलिए इस दौरान महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव राजनीतिक हेराफेरी का कारण बन सकते हैं। वे चुनावों के बाद निष्पक्ष और सहमतिपूर्ण चर्चा चाहते हैं।

ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा क्यों मांगे जा रहे हैं?

वर्तमान कानून में एससी और एसटी महिलाओं के लिए सब-क्वोटा है, लेकिन ओबीसी महिलाएं इससे बाहर हैं। विपक्ष का तर्क है कि सामाजिक न्याय पूर्ण तभी होगा जब ओबीसी महिलाओं को भी विशेष प्रावधान दिए जाएं, वरना उनके विकास में बाधा आएगी।

क्या लोक सभा की कुल सीटें बढ़ेंगी?

सरकार के प्रस्तावित विधेयकों में लोक सभा की सीटें वर्तमान 543 से बढ़ाकर 816 करने का सुझाव है। इससे कुल मिलाकर 273 सीटें सीधे महिलाओं के आरक्षित हो जाएंगी और डिलीमिटेशन की प्रक्रिया को छोड़कर आरक्षण लागू किया जा सकेगा।

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