मानसिक स्वास्थ्य क्या है? सरल शब्दों में समझें

जब हम शरीर की देखभाल करते हैं, तो दिमाग को भी उतनी ही जरूरत होती है। मानसिक स्वास्थ्य मतलब आपका मन शांत, संतुलित और रोज़मर्रा के दबाव से लड़ने लायक होना। अगर आप कभी उदास, चिड़चिड़ा या थका-हारा महसूस करते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि दिमाग को थोड़ा‑बहुत आराम चाहिए।

दैनिक जीवन में आसान मानसिक स्वास्थ्य अभ्यास

सबसे पहले एक छोटी आदत अपनाएँ: सुबह उठते ही 5 मिनट गहरी सांसें लें। नाक से धीरे‑धीरे इनहेल करें, फिर मुँह से एक्सहेल। यह सादा अभ्यास तनाव के हार्मोन को घटा देता है और दिमाग को साफ़ कर देता है।

दूसरा कदम – स्क्रीन टाइम कम करें। फोन या टीवी पर घंटों तक स्क्रॉल करने की जगह, हर दो घंटे में 10‑15 मिनट चलना या स्ट्रेच करना बेहतर रहता है। हल्का व्यायाम एंडोर्फिन छोड़ता है, जिससे मूड तुरंत बेहतर होता है।

तीसरा टिप – अपना विचार लिखें। एक नोटबुक रखें और दिन में दो बार (सुबह और शाम) अपने भावनाओं को शब्दों में उतारें। जब आप लिखते हैं तो दिमाग के उलझे हुए बक्से खुल जाते हैं, जिससे तनाव कम होता है।

चौथा आसान तरीका – ‘कृतज्ञता’ की आदत डालें। सोने से पहले तीन चीज़ें लिखें जिनके लिए आप धन्यवाद देते हैं। यह छोटे‑छोटे सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देता है और नींद में सुधार लाता है।

जब मदद चाहिए – कहाँ और कैसे पहुंचें

अगर ऊपर बताए कदमों से भी आपको राहत नहीं मिल रही, तो प्रोफेशनल की मदद लेना ठीक रहेगा। भारत में कई सरकारी और निजी हेल्पलाइन हैं: मनोविज्ञान विभाग के 24×7 टोल‑फ़्री नंबर 080-46110007, या नेशनल साइको‑सॉशल हेल्पलाइन 1800‑599‑0019. इनसे आप बिना किसी खर्चे के सलाह ले सकते हैं।

ऑनलाइन थेरेपी भी एक आसान विकल्प है। कई ऐप्स (जैसे BetterHelp, YourDost) में प्रमाणित काउंसलर होते हैं जो चैट या वीडियो कॉल के ज़रिये सत्र देते हैं। यह सुविधा घर बैठे ही मिलती है और समय की बचत करती है।

भरोसा बनाने वाले दोस्त या परिवार का भी बड़ा रोल होता है। जब आप अपनी समस्या शेयर करते हैं, तो दिमाग में जमा तनाव कम हो जाता है। अगर कोई खास बात नहीं खुल पाती, तो लिखी हुई डायरी को दिखा सकते हैं – कभी‑कभी कागज़ पर शब्द अधिक स्पष्ट होते हैं।

अंत में याद रखें कि मानसिक स्वास्थ्य एक सतत प्रक्रिया है। रोज़ छोटे‑छोटे कदम उठाने से बड़े बदलाव आते हैं। त्रयी समाचार के “मानसिक स्वास्थ्य” टैग पेज पर हम नियमित रूप से नई जानकारी, विशेषज्ञ इंटरव्यू और सरल टिप्स डालते रहते हैं, तो आप भी यहाँ आएँ और ताज़ा लेख पढ़ें। आपका दिमाग स्वस्थ रहेगा, आपका दिन रोशन होगा।

स्किजोफ्रेनिया ट्रिगर पॉइंट्स: भारत में जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारण
Ranjit Sapre

स्किजोफ्रेनिया ट्रिगर पॉइंट्स: भारत में जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारण

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स्किजोफ्रेनिया ट्रिगर पॉइंट्स: भारत में जोखिम बढ़ाने वाले प्रमुख कारण

स्किजोफ्रेनिया के जोखिम में भारत में जेनेटिक, सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण शामिल हैं। बेरोजगारी, कम शिक्षा और 30–49 वर्ष की उम्र के पुरुष ज्यादा प्रभावित होते हैं। 72% उपचार गैप चिंता बढ़ाता है। इन ट्रिगर्स की जल्दी पहचान ही प्रभावी समाधान की कुंजी है।

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