सावरकर को लेकर राहुल गांधी पर शिवसेना (UBT) नेता का तगड़ा हमला
नासिक में सावरकर जयंती के मौके पर उस वक्त माहौल गरमा गया, जब शिवसेना UBT के डिप्टी सिटी यूनिट चीफ बाला दाराडे ने राहुल गांधी के खिलाफ खुला ऐलान कर डाला। दाराडे ने भीड़ के सामने कहा कि अगर राहुल गांधी नासिक आएंगे, तो उनका चेहरा काला किया जाएगा या उनके काफिले पर पत्थर फेंके जाएंगे।
ऐसा बयान सीधा-सीधा सावरकर के सम्मान से जुड़ा है। दरअसल, कुछ समय पहले राहुल गांधी ने वीडी सावरकर को ‘माफी वीर’ कहकर निशाना बनाया था, जिससे सावरकर समर्थकों में गुस्सा है। दाराडे ने उसी नाराज़गी को सामने लाते हुए कहा कि शिवसैनिक सावरकर का अपमान कतई नहीं सह सकते।
इस बयान के सामने आते ही कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस नेताओं ने दाराडे के शब्दों को कायराना हरकत बता दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या बीजेपी-शिवसेना सत्ता में रहते हुए लोकतंत्र और असहमति की जगह पूरी तरह खत्म कर देना चाहती हैं?
MVA में सावरकर को लेकर नई दरार, कोर्ट में भी मामला पहुंचा
इस ताज़ा घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) में दरार पैदा कर दी है। एमवीए तीन दलों—शिवसेना (UBT), कांग्रेस और एनसीपी—का गठबंधन है, जो एकजुट होकर बीजेपी को टक्कर देना चाहता है। मगर, सावरकर का मुद्दा बार-बार इनके बीच तकरार की वजह बनता रहा है।
राहुल गांधी की टिप्पणी से वैसे भी शिवसेना दबी-छुपी नाराज़गी जाहिर करती रही है, लेकिन अब उसके स्थानीय नेता सरेआम धमकी दे रहे हैं। इससे गठबंधन की एकजुटता पर बड़े सवाल उठने लगे हैं। ज्यादातर कांग्रेस नेता सहयोगियों की सार्वजनिक आलोचना पर चुप्पी साधे हुए हैं, मगर अंदरखाने नाराजगी पनप रही है।
इस विवाद के साथ ही नासिक के स्थानीय निवासी देवेंद्र भूतड़ा ने राहुल गांधी के खिलाफ अदालत में मानहानि केस दायर किया है। भूतड़ा का आरोप है कि राहुल की टिप्पणियों से न सिर्फ हिंदुत्व विचारधारा बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाएं भी आहत हुई हैं।
- राहुल गांधी की टिप्पणी ने सावरकर को लेकर पुराने घाव फिर से कुरेद दिए हैं।
- शिवसेना (UBT) के ऐसे तीखे बोल गठबंधन की रणनीति और अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।
- कांग्रेस भी सवालों के घेरे में है कि वह सहयोगियों को कैसे साधेगी।
सावरकर की विरासत, खासकर कांग्रेस बनाम शिवसेना के नजरिये से, पिछली कई सियासी बहसों का हिस्सा रही है। राहुल गांधी इस मुद्दे पर पहले भी बीजेपी, आरएसएस और हिंदुत्व समर्थकों द्वारा बार-बार निशाने पर आ चुके हैं। कहीं न कहीं, दो अलग सोच रखने वाले दलों की यह साझेदारी सावरकर के नाम पर बार-बार लड़खड़ाती दिखती है।
Ketkee Goswami
मई 29, 2025 AT 18:31इतना गरम माहौल में राजनीति का स्वाद और भी खट्टा हो गया।
Shraddha Yaduka
जून 6, 2025 AT 03:33सावरकर का सम्मान करना हर भारतीय की जिम्मेदारी है, चाहे वह कोई भी पार्टी हो।
भाई‑बहनों ने इस तरह के उकसावे को शान्ति से ही खारिज किया तो देश में वास्तव में एकता फलीभूत होगी।
हिंसक शब्दों से कुछ नहीं सुधरेगा, सिर्फ बहस से ही मुद्दे सुलझ सकते हैं।
आइए हम सब मिलकर इस परिस्थिति को ठंडे दिमाग से देखें।
gulshan nishad
जून 13, 2025 AT 12:46देखो, यह तमाशा हमेशा से चल रहा है, लेकिन अब धरती पर धूल नहीं, खून की बौछार हो रही है।
राहुल जी की एक टिप्पणी ने फिर से सावरकर के जयंती को आग लगा दी।
शिवसेना के इस नेता का बयान बस दिखावा है, असल में लोगों को डराकर वोट जमा करना चाह रहा है।
भारी आवाज़ में कहा गया “काला किया जाएगा” सिर्फ एक भद्दा तमाशा है।
ऐसे शोर में असली मुद्दे पीछे छिप जाते हैं।
Ayush Sinha
जून 20, 2025 AT 22:00धमकीभरे मामलों को ले कर हमेशा दो तरह की सोच होती है-एक तो शोर मचाने का, दूसरा असली समस्या का समाधान ढूँढने का।
अब देखिए, इस मुद्दे में सिर्फ आवाज़ें नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय की जरूरत है।
Saravanan S
जून 28, 2025 AT 07:13भाई, हमें यह समझना चाहिए कि सावरकर के विचारों की रक्षा सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि उनके आदर्शों की भी।
अगर हम इस हंगामे को शान्ति से नहीं सुलझाते, तो भविष्य में और भी बड़ी त्रुटियाँ हो सकती हैं, और यह हमारे समाज को खा जाएगी, इसलिए संयम रखें, बहस को ठंडे दिमाग से आगे बढ़ाएँ, और सभी पक्षों को सुनें, तभी हम सही दिशा में चल पाएँगे।
Alefiya Wadiwala
जुलाई 5, 2025 AT 16:26पहले तो यह स्पष्ट हो गया कि इस विवाद का मूल कारण है इतिहास के प्रति अलग‑अलग दायरों की समझ, और यह समझना आवश्यक है कि सावरकर के विचारों को केवल राजनैतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना लोकतंत्र की बुनियादी नींव को कमजोर करता है।
दूसरी ओर, राहुल गांधी की टिप्पणी ने उन संवेदनशील कोर को छेड़ दिया जिस पर कई लोग अपनी पहचान बनाते हैं, और इस कारण से एक ही क्षण में ग़ुस्सा और नाराज़गी का तूफ़ान उठ गया।
तीसरा पहलू यह है कि शत्रु अनुचित शब्दों का प्रयोग करके जनता में दर पैदा करने की कोशिश करता है, जिससे वह अपनी पहुँच बढ़ा सके, परंतु यह केवल अस्थायी रूप से प्रभावी हो सकता है।
चौथा, हम देख रहे हैं कि इस प्रकार के विवादों में अक्सर मीडिया का उपयोग करके मुद्दे को बढ़ा‑चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है, जिससे जनता में भ्रम उत्पन्न होता है।
पाँचवाँ, नासिक की स्थानीय राजनीति में इस प्रकार की घटना स्थानीय स्तर पर गहरी ध्रुवीकरण का संकेत देती है, और यह बहुत ख़राब विकास को दर्शाता है।
छठा, इस स्थिति में MVA जैसी गठबंधन को अपने अंदरूनी सामंजस्य को पुनः स्थापित करने की ज़रूरत है, नहीं तो उनका लक्ष्य ही विफल हो जाएगा।
सातवाँ, यह देखना महत्वपूर्ण है कि न्यायिक कार्रवाई के माध्यम से किस प्रकार से मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता है, क्योंकि यह सामाजिक संतुलन को पुनः स्थापित करने में मदद कर सकता है।
आठवाँ, आधुनिक राजनीति में व्यक्तिगत हमले अक्सर नीति‑निर्धारण के बजाय व्यक्तिगत प्रतिशोध बनने का खतरा रखते हैं, इसलिए हमें इसे रोकने के लिये इकाई‑स्तर पर कदम उठाने चाहिए।
नवाँ, इस प्रकार के बयान से सार्वजनिक शांति पर प्रभाव पड़ता है, और यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस प्रभाव को न्यूनतम रखें।
दसवाँ, इस वाद‑विवाद को केवल एक पक्ष की जीत‑हार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सामाजिक संवाद के एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
ग्यारहवाँ, हमें यह भी समझना चाहिए कि इतिहास के प्रतीकों को लेकर भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ स्वाभाविक हैं, परन्तु उन प्रतिक्रियाओं को हिंसा में बदल देना अस्वीकार्य है।
बारहवाँ, यह स्थिति इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक दल कैसे छोटे‑छोटे मुद्दों को बड़े स्तर पर ले जाकर अपनी प्रभावशीलता बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
तेरहवाँ, इस विवाद के समाधान में सभी पक्षों को मिलकर एक समझौते पर पहुँचने की आवश्यकता है, जिससे कि लोकतांत्रिक मूल्यों को सुरक्षित रखा जा सके।
चौदहवाँ, अंत में यह कहना जरूरी है कि सावरकर के विचारों और उनके सम्मान को लेकर यह बहस केवल एक मंच पर नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्तर पर चलनी चाहिए, जिससे कि सभी आवाज़ों को बराबर सम्मान मिले।
पंद्रहवाँ, और अंत में, इस ग़ैर‑ज़रूरी हिंसा को रोकने के लिये हमें शिक्षा, संवाद और संवेदनशीलता को बढ़ावा देना चाहिए, तभी हम एक स्वस्थ लोकतंत्र की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
Paurush Singh
जुलाई 13, 2025 AT 01:40यहाँ से एक बात स्पष्ट है-भाषा का दुरुपयोग न केवल व्यक्तिगत बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विश्वास को कमज़ोर करता है; हमें इस रास्ते से बचकर वास्तविक विचार‑विनिमय की ओर बढ़ना चाहिए, तभी असली प्रगति संभव होगी।
Sandeep Sharma
जुलाई 20, 2025 AT 10:53अरे यार, इस मवेशी वाले बहस में कोई नई बात नहीं निकली! 😂
जैसे कहती हैं, राजनीति में सबको एक‑दूसरे का टेबल घुमाना पड़ता है, पर कभी‑कभी तो कबाब भी चाहिए।
चलो, अब इस विवाद को हवा में छोड़ दो, और देखो असली राजनीति कौन करता है।
Mita Thrash
जुलाई 27, 2025 AT 18:31सभी पक्षों की भावनाओं को समझते हुए, हमें इस तकरार को संवाद के मंच पर लाना चाहिए, न कि कलाई‑कोहनी के मैदान में।
सामाजिक एकता और ऐतिहासिक सम्मान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, इसलिए हम सब मिलकर एक संतुलित रास्ता निकाल सकते हैं।