काम का दबाव: भारत में इसके प्रभाव, कारण और लोगों की लड़ाई

जब आप कहते हैं काम का दबाव, वह अनुभव जिसमें कार्य की मात्रा, समय या अपेक्षाएँ इतनी ज्यादा हो जाएं कि व्यक्ति तनाव में फंस जाए, तो आप सिर्फ ऑफिस की बात नहीं कर रहे। यह एक भारतीय अध्यापिका की रात की नींद है जो बच्चों के बोर्ड परिणाम की चिंता से जाग जाती है। यह एक ऑटो चालक की सुबह की चाहत है जो लॉटरी जीतने की उम्मीद से गाड़ी चलाता है। यह एक क्रिकेटर का दिल है जो विश्व कप फाइनल में जीत के लिए दबाव में बल्ला उठाता है। मानसिक स्वास्थ्य, मन की स्थिति जो दबाव, चिंता या थकान से प्रभावित होती है अब सिर्फ डॉक्टर की क्लिनिक का मुद्दा नहीं, बल्कि हर घर, हर ऑफिस और हर स्कूल का विषय बन गया है।

काम का दबाव केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज के हर पहलू में छिपा है। जब बैंक छुट्टी, किसी धार्मिक या सामाजिक घटना के कारण बैंकों का बंद रहना ओडिशा और मणिपुर में रथ यात्रा के लिए घोषित होती है, तो यह दिखाता है कि भारतीय जीवन में काम और सामाजिक जिम्मेदारियाँ कैसे टकराती हैं। जब क्रिकेटर जैसे नश्रा संधु या हरमनप्रीत कौर टीम के लिए जीत के दबाव में बल्ला घुमाते हैं, तो वह दबाव उनके घर की उम्मीदों का भी प्रतिबिंब है। यही दबाव है जिसने एक ऑटो चालक को ऑनाम लॉटरी जीतने के लिए प्रेरित किया, और जिसने एक अध्यापिका को रात भर बच्चों के उत्तर पत्र पढ़ने के लिए मजबूर किया। कार्य स्थल, वह जगह जहाँ लोग अपना समय, ऊर्जा और मानसिक स्वास्थ्य खर्च करते हैं आज एक ऐसा मैदान बन गया है जहाँ लोग न सिर्फ नौकरी करते हैं, बल्कि अपनी पहचान भी खोजते हैं।

कभी-कभी यह दबाव खेल के मैदान पर दिखता है, तो कभी बैंकों के बंद होने के निर्णय में। कभी यह एक लड़की के शतक के बाद तीर-धार जश्न में छिपा होता है, तो कभी एक क्रिकेटर के कंधे के टूटने के बाद भी बल्ला उठाने में। यह दबाव न तो सिर्फ भारतीयों के लिए नया है, न ही यह केवल एक व्यक्ति की कहानी है। यह एक समाज की कहानी है—जहाँ हर छोटी जीत, हर बड़ी हार, हर छुट्टी और हर रात की नींद एक लड़ाई का हिस्सा है। नीचे दिए गए लेखों में आप इसी दबाव के अलग-अलग रूप देखेंगे: कैसे यह खेलों को बदल रहा है, कैसे यह बैंकों की छुट्टियों का कारण बन रहा है, और कैसे यह एक आम इंसान की रोज़ की सुबह को बदल रहा है।

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Ranjit Sapre नवंबर 16, 2025 राजनीति 17 टिप्पणि
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