अगर आप या आपका कोई करीब का व्यक्ति अक्सर सोच‑समझ कर बात नहीं पा रहा, हकीकत से अलग दुनिया में खोया लगता है या अचानक भावनाओं पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है तो यह स्किजोफ्रेनिया की निशानी हो सकती है। इस लेख में हम बताएँगे कि ये रोग क्या होता है, कैसे पहचानें और मदद के क्या‑क्या उपाय हैं। पढ़ते रहिए, जानकारी से ही डर कम होगा।
स्किजोफ्रेनिया में तीन बड़े समूह के लक्षण होते हैं – विचार‑धारा, व्यवहार और भावनात्मक बदलाव। सबसे आम संकेत हैं:
इनमें से कोई भी लक्षण लगातार दो हफ़्ते से ज़्यादा दिखे तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है। शुरुआती पहचान इलाज की सफलता बढ़ाती है।
स्किजोफ्रेनिया का कारण अभी पूरी तरह नहीं पता, लेकिन कई बातों को असरदार माना जाता है:
उपचार दो मुख्य भागों से बनता है – दवा और मनोवैज्ञानिक मदद। एंटी‑साइकोटिक दवाएँ लक्षण कम करती हैं, जबकि साईकोथेरेपी (जैसे कॉग्निटिव बिहेवियर थेरापी) सोच‑धारा को सुधरने में मदद करती है। परिवार का सपोर्ट और नियमित फॉलो‑अप भी जरूरी है क्योंकि रोग की अवधि लंबी हो सकती है।
अगर आप या आपके जानने वाले को यह समस्या लगती है, तो जल्द से जल्द मनोचिकित्सक या साइकियाट्रिस्ट से अपॉइंटमेंट बुक करें। कई अस्पतालों में मुफ्त काउंसलिंग और दवा का प्रोग्राम उपलब्ध होता है। साथ‑साथ स्वस्थ जीवनशैली – नियमित नींद, संतुलित आहार और हल्का व्यायाम भी लक्षणों को कम कर सकता है।
स्मार्टफ़ोन या इंटरनेट पर अक्सर गलत जानकारी मिलती है। भरोसेमंद स्रोत जैसे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य पोर्टल या डॉक्टर की सलाह ही अपनाएँ। याद रखिए, स्किजोफ्रेनिया एक इलाज़ योग्य बीमारी है और सही मदद से जीवन फिर से सामान्य हो सकता है।
आपके सवालों के जवाब, नई शोध और स्थानीय सहायता समूहों के लिंक नीचे दिए गए हैं। पढ़ते रहिए, समझते रहिए – यह आपका सबसे बड़ा कदम होगा।
अप्रैल 21, 2025
स्किजोफ्रेनिया के जोखिम में भारत में जेनेटिक, सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण शामिल हैं। बेरोजगारी, कम शिक्षा और 30–49 वर्ष की उम्र के पुरुष ज्यादा प्रभावित होते हैं। 72% उपचार गैप चिंता बढ़ाता है। इन ट्रिगर्स की जल्दी पहचान ही प्रभावी समाधान की कुंजी है।
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